दिनांक 22 जनवरी 2017, समय करीब शाम के 6 बजे, ये समय और तारीख याद करने लायक है. घबराइए मत इस समय ना ही किसी नोटबंदी का ऐलान हुआ है और ना ही कोई फिल्म बैन हुई है. हां, भारतीय राजनीति इतिहास की सबसे पुरानी पार्टी के पतन का एक और अध्याय जरूर शुरु हुआ है. 
जी, आने वाले उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी में गठबंधन का ऐलान हुआ है. दोनों दल आने वाले चुनाव में साथ लड़ेंगे और भारतीय जनता पार्टी व नरेंद्र मोदी के विजय रथ और 2019 में इतिहास दोहराने के सपने पर ब्रेक लगाने की कोशिश करेंगे. 
चुनाव से पहले राजनीतिक दलों में गठबंधन होना कोई चौंकाने वाली या फिर कोई नई बात नहीं है ये तो हमारे यहां होता ही रहता है, लेकिन फिर भी इस गठबंधन की बात तो थोड़ी अलग है. 
कांग्रेस पार्टी जिसने लगभग 60 वर्षों तक देश की सत्ता चलाई है और जिसका इतिहास 100 वर्ष से भी अधिक पुराना है वो इस गठबंधन की स्थिति में किसी भीगी बिल्ली की तरह नजर आई तो वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक बब्बर शेर की तरह जो अपनी ऊंगली पर भीगी बिल्ली को नचा रहे थे. 
गठबंधन की चर्चा तो बहुत पहले से ही चल रही थी, समय-समय पर दोनों दलों के नेताओं ने एक-दूसरे की तारीफों में पुल तो क्या पूरे फ्लाईओवर भी बनाए थे, लेकिन हर बार बात समाजवादी पार्टी में चल रहे घमासान और टिकटों के बंटवारे के नाम पर टल जाती थी. कांग्रेस जो हमेशा से ही 120 से अधिक सीटों की मांग पर अड़ी रही वहीं भैया जी में ठाने थे कि 100 से ऊपर नहीं देंगे और हर बार दांव अखिलेश यादव का ही भारी पड़ा. उनके नेताओं ने हर समय कहा कि हमें गठबंधन की जरुरत नहीं है हम अखिलेश यादव के नाम पर अकेले दम पर सरकार बना लेंगे तो कांग्रेस भी थोड़ी सहमी-सहमी सी थी. अभी कुछ दिन पहले ही जब गठबंधन पर थोड़ी आना-कानी सी चल रही थी तो अखिलेश ने अपनी 191 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करदी और इनमें उन जगह के उम्मीवार शामिल थे जहां पर कांग्रेस के विधायक हैं या कांग्रेस चुनाव लड़ना चाहती है अमेठी और रायबरेली समेत. ये अखिलेश की हुंकार थी और कांग्रेस को समझ में आया कि गठबंधन अखिलेश की मर्जी से ही करना पड़ेगा औऱ अब गठबंधन का ऐलान हुआ तो फैसला हुआ कि कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और समाजवादी पार्टी 298 सीटों पर. 
कांग्रेस को पता था कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में वो दूर-दूर तक कहीं नहीं है वहीं वह भी जान रही थी कि सूबे में अखिलेश के नाम की आंधी ना सही लेकिन हल्की-फुल्की हवा तो है और ये हवा ही उन्हें सूबे की राजनीति में थोड़ी ऑक्सीजन दे सकती है. इसी कारण कांग्रेस अखिलेश की हर बात मानने को तैयार थी, कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार शीला दीक्षित ने तो पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह अखिलेश यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ने को तैयार हैं और हुआ भी वो ही. कांग्रेस रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कई मौकों पर मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की लेकिन घर की लड़ाई के दौरान नेताजी ने गठबंधन को भाव ना देते हुए कहा था कि हम अकेले ही चुनाव लड़ेंगे लेकिन अखिलेश के बॉस बनते ही उनकी मर्जी चली और गठबंधन हुआ वो भी अखिलेश की मर्जी से. 
गठबंधन की इस ऊठा-पटक में यह को दिखा ही है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी एक राज्य में सत्ता में वापसी के लिए किस तरह तड़प रही है और एक क्षेत्रीय दल के आगे किस तरह घुटने टेकने पर मजबूर हुई है. वहीं गठबंधन में दिखा है कि कभी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक सूबे के मुखिया और क्षेत्रीय दल के नेता के सामने बौने साबित हुए हैं और गठबंधन में नंबर दो के नेता की हैसियत से दिखाई देंगे.    

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