तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश एक बार फिर अपने लोकतंत्र का जश्न मनाने की तैयारी में है. लोकतंत्र का जश्न यानि चुनाव, जहां लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनते है यह आम चुनाव नहीं हैं बल्कि पांच राज्यों में होने वाले चुनाव हैं. चुनाव आयोग के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के ऐलान के साथ ही सभी राजनीतिक दल इस महाकुंभ में कूदने को तैयार हैं. यह पांच राज्य हैं उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब और मणिपुर जहां आने वाले दो महीने सिर्फ नेताओं के भाषण का शोर, जिंदाबाद और मुर्दाबाद के नारे और लाखों कभी ना पूरे होने वाले वादे ही सुनाई देंगे.

2009 के समय से जब देश में घोटालों का दौर शुरु हुआ था तब से लोग राजनीति में ज्यादा ही दिलचस्पी लेने लगे हैं और उसके बाद 2011 के अन्ना आंदोलन ने इस दिलचस्पी को देश के करोड़ों युवाओं तक पहुंचाया और आज देखिए बहुत से युवा राजनीति में हैं. जो नहीं भी हैं वह सोशल मीडिया, गली के नुक्कड़ और चाय की टपरी पर बैठ कर देश की राजनीति में अपना योगदान देते रहते है. हर किसी की राय से पता चलता है कि देश का राजनीतिक दौर अपनी ऊंचाईयों को छू रहा है.

अब चुनाव की बात करते है, जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं उनमें से सबसे बड़ा राज्य है उत्तर प्रदेश जहां राजनीति में अगर एक पत्ता भी हिलता है तो देश की राजनीति में तूफान आ जाता है. और आजकल यहां की राजनीति में मानों सूनामी सी आई हो. सत्ताधारी दल समाजवाजदी पार्टी में पार्टी पर कब्जे की जंग बाप-बेटे-चाचा के रिश्ते में उलझी है और दिन पर दिन उलझती ही जा रही है.

नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव ने 2012 में सोचा होगा कि बेटा अखिलेश ऑस्ट्रेलिया से पढ़कर आया है यहां कि राजनीति कम ही समझता है चलिए राज्य बेटे को देते है और खुद प्रधानमंत्री पद की ओर कदम बढ़ा देते हैं. शुरुआती दिनों में हुआ भी ऐसा ही 2012 में सरकार बनाने के बाद से लेकर 2014 के लोकसभा चुनावों तक अखिलेश यादव सिर्फ अपने पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल यादव, वरिष्ठ मंत्री आजम खान, अंकल अमर सिंह और दूसरे चाचा रामगोपाल यादव के नुमांइदे के तौर पर ही दिखे, उनके द्वारा लिए गए कई फैसले बदले भी गए.

          

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है 2014 में लोकसभा चुनावों में हार के बाद से ही अखिलेश यादव ड्राइविंग सीट संभाल रहे थे और खुद निर्णय लेना शुरु किया. काम किया भी और दिखा भी, जमीन पर भी और सोशल मीडिया पर भी बस कमी थी तो कानून-व्यवस्था की. लेकिन उम्मीद थी कि यह भी ठीक हो जाएगा और सभी कुछ ठीक चल रहा था लग रहा था कि इस बार इतिहास बदलेगा और सूबे में पहली बार कोई सरकार लगातार दूसरी बार सत्ता में वापिस आएगी. बस फिर क्या था नज़र लग गई और पारिवारिक कलह दुनिया के सामने ढ़ोल बजा-बजा कर होने लगी और अब सत्ता वापसी तो क्या चुनाव लड़ने के ही टोटे पड़ रहे है.

वहीं दूसरी ओर 2014 के लोकसभा चुनावों में खाता ना खुलने से राजनीति से एक तरह से गुम हुईं मायावती को आस है कि यह पारिवारिक लड़ाई उनके लिए फायदेमंद साबित होगी और वह भी रोजाना बोरिया-बिस्तर लेकर प्रेस कांफ्रेंस बुला लेती हैं और सपा-बीजेपी को आड़े हाथ लेकर खूब धोती है. लेकिन मायावती अभी भी पुराने ढर्रे की राजनीति पर ही निर्भर लगती हैं, वही प्रेस कांफ्रेंस, वही बड़ी-बड़ी रैलियां या जाति के नाम पर किए जा रहे सम्मेलन और कुछ नहीं. लेकिन इस बार मायावती दलित वोटों के साथ-साथ मुस्लिमों वोटों पर भी दांव खेल रही हैं अभी तक बसपा की ओर से जारी की गई उम्मीदवारों की लिस्ट में काफी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार शामिल हैं.

         

इन सबसे अलग केंद्र की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी राज्य की सरकार में अपने 14 साल के वनवास को मोदीनाम पर खत्म होने का सपना सजोंए बैठी है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को उम्मीद है कि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दे बीजेपी को बढ़त दिलवाएंगे और सपा की अंतर्कलह उन्हें बहुमत. हालांकि पेंच अभी राज्य में मुख्यमंत्री पद के लिए किसे आगे किया जाए उसपर फंसा है क्योंकि अगर बीजेपी सपा के अंतर्कलह का फायदा उठा सत्ता में वापसी करना चाहती है तो उसे अखिलेश का मुकाबले लायक कोई बड़ा चेहरा सामने लाना पड़ेगा जो जनता में चर्चित भी हो और उसकी छवि ईमानदार भी हो वरना बीजेपी का यहां भी दिल्ली और बिहार जैसा ही हाल होगा.

                 

इन सभी में कांग्रेस का वजन कमज़ोर ही दिखता है, वह आस लगाए हुए है कि अखिलेश को सपा की कमान मिले और वह समाजवादियों से गठबंधन करलें और किसी तरह सत्ता में वापसी कर ले. कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तो इसका ऐलान भी कर दिया है कि अगर उनकी पार्टी का सपा के साथ गठबंधन होता है तो वह अखिलेश के लिए मुख्यमंत्री पद की रेस से पीछे हटने को तैयार हैं.

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र अपने भारत में ठंड के इस सर्द मौसम में चुनावी और राजनीतिक गर्मी का तड़का लगने को एकदम तैयार है. बस स्वाद लीजिए इस तड़के का...क्योंकि चुनाव है भई चुनाव !

जय हिंद !   

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Published by Mohit Grover